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Cycle Ka Avishkar Kisne Kiya,Types,History

by Manish Sharma
Cycle Ka Avishkar Kisne Kiya

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दोस्तों आप लोगों में से कई लोगों के मन में साईकिल का आविष्कार किसने किये (Cycle Ka Avishkar Kisne Kiya) ,कब किया, कैसे किया, जैसे सवाल उत्पन्न होते होंगे और अगर आप भी साईकिल से जुड़े इन सवालों के जवाब ढूंढ रहे हैं तो इस आर्टिकल को पूरा जरूर पढ़ें।

परिचय (Introduction):

साइकिल, जिसे बाइक या बाइसाइकल भी कहा जाता है, एक मानव-चालित या मोटर-चालित, पैडल-चालित, एकल-ट्रैक वाहन है, जिसमें दो पहिए एक फ्रेम से जुड़े होते हैं, एक के पीछे एक। साइकिल सवार को साइकिल चालक कहा जाता है।

19 वीं शताब्दी में यूरोप में साइकिल की शुरुआत की गई थी, और 21 वीं सदी की शुरुआत में, एक समय में 1 अरब से अधिक अस्तित्व में थी। ये संख्या कारों की संख्या से अधिक है, दोनों कुल और उत्पादित व्यक्तिगत मॉडल की संख्या से क्रमबद्ध हैं। साईकिल कई क्षेत्रों में परिवहन के प्रमुख साधन हैं। ये मनोरंजन का एक लोकप्रिय रूप भी प्रदान करती हैं, और बच्चों के खिलौने, सामान्य फिटनेस, सैन्य और पुलिस अनुप्रयोगों, कूरियर सेवाओं, साइकिल रेसिंग और साइकिल स्टंट के रूप में उपयोग के लिए अनुकूलित कि गई हैं।

आविष्कार (Invention):

1839 में स्कॉटलैंड के एक लुहार किर्कपैट्रिक मैकमिलन द्वारा आधुनिक साइकिल का आविष्कार होने से पूर्व यह अस्तित्व में तो थी पर इस पर बैठकर जमीन को पांव से पीछे की ओर धकेलकर आगे की तरफ़ बढ़ा जाता था। मैकमिलन ने इसमें पहिये को पैरों से चला सकने योग्य व्यवस्था की।

ऐसा माना जाता है कि 1817 में जर्मनी के बैरन फ़ॉन ड्रेविस ने साइकिल की रूपरेखा तैयार थी। यह लकड़ी की बनी सायकिल थी तथा इसका नाम ड्रेसियेन रखा गया था। उस समय इस साइकिल की गति 15 किलो मीटर प्रति घंटा थी। इसका थोड़ा बोहोत प्रयोग 1830 से 1842 के बीच हुआ था।

इसके बाद मैकमिलन ने बिना पैरों से घसीट कर चलाये जा सकने वाले यंत्र की खोज की जिसे उन्होंने वेलोसिपीड का नाम दिया था। पर अब ऐसा माना जाने लगा है कि इससे बहुत पूर्व 1763 में ही फ्रांस के पियरे लैलमेंट ने इसकी खोज की थी।

Evolution of Bicycle

Evolution of Bicycle

इतिहास( History):

यूरोपीय देशों में बाइसिकिल के प्रयोग का विचार लोगों के दिमाग में 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ही आ चुका था, लेकिन इसे मूर्तरूप सर्वप्रथम सन् 1816 में पेरिस के एक कारीगर ने दिया। उस यंत्र को हॉबी हॉर्स, अर्थात काठ का घोड़ा, कहते थे। पैर से घुमाए जानेवाले क्रैंकों (पैडल) युक्त पहिए का आविष्कार सन् 1865 ई. में पैरिस निवासी लालेमेंट (Lallement) ने किया। इस यंत्र को वेलॉसिपीड (Velociped) कहते थे।

इसपर चढ़नेवाले को बेहद थकावट हो जाती थी। अत: इसे हाड़तोड (bone shaker) भी कहने लगे। इसकी सवारी, लोकप्रिय हो जाने के कारण, इसकी बढ़ती माँग को देखकर इंग्लैंड, फ्रांस और अमेरिका के यंत्र निर्माताओं ने इसमें अनेक महत्वपूर्ण सुधार कर सन् 1872 में एक सुंदर रूप दे दिया, जिसमें लोहे की पतली पट्टी के तानयुक्त पहिए लगाए गए थे। इसमें आगे का पहिया 30 इंच से लेकर 64 इंच व्यास तक और पीछे का पहिया लगभग 12 इंच व्यास का होता था। इसमें क्रैंकों के अतिरिक्त गोली के वेयरिंग और ब्रेक भी लगाए गए थे।

भारत में भी साइकिल के पहियों ने आर्थिक तरक्की में अहम भूमिका निभाई। 1947 में आजादी के बाद अगले कई दशक तक देश में साइकिल यातायात व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा रही। खासतौर पर 1960 से लेकर 1990 तक भारत में ज्यादातर परिवारों के पास साइकिल थी। यह व्यक्तिगत यातायात का सबसे ताकतवर और किफायती साधन था।

गांवों में किसान साप्ताहिक मंडियों तक सब्जी और दूसरी फसलों को साइकिल से ही ले जाते थे। दूध की सप्लाई गांवों से पास से कस्बाई बाजारों तक साइकिल के जरिये ही होती थी। डाक विभाग का तो पूरा तंत्र ही साइकिल के बूते चलता था। आज भी पोस्टमैन साइकिल से चिट्ठियां बांटते हैं।

जमाना बदला और कूरियर सेवाएं ज्यादा भरोसेमंद बन गईं, लेकिन साइकिल की अहमियत यहां भी खत्म नहीं हुई। बड़ी संख्या में कूरियर बाँटने वाले भी साइकिल का इस्तेमाल करते हैं। 1990 में देश में उदारीकरण की शुरुआत हुई और तेज आर्थिक बदलाव का सिलसिला शुरू हुआ। देश की युवा पीढ़ी को मोटरसाइकिल की सवारी ज्यादा भा रही थी।

लाइसेंस परमिट राज में स्कूटर के लिए सालों इंतजार करने वालों का धैर्य टूट गया था। उदारीकरण के कुछ साल बाद शहरी मध्यवर्ग को अपने शौक पूरे करने के लिए पैसा खर्च करने में हिचक नहीं थी। शहरों में मोटरसाइकिल का शौक बढ़ रहा था। गांवों में भी इस मामले में बदलाव की शुरुआत हो चुकी थी। राजदूत, बुलेट और बजाज समूह के स्कूटर नए भारत में पीछे छूट रहे थे। हीरो होंडा देश की नई धड़कन बन रही थी।

यह बदलाव आने वाले सालों में और तेज हुआ। देश में बदलाव के दोनों पहिये बदल गए थे। इसके बावजूद भारत में साइकिल की अहमियत खत्म नहीं हुई है। शायद यही वजह है कि चीन के बाद दुनिया में आज भी सबसे ज्यादा साइकिल भारत में बनती हैं।

नब्बे के दशक के बाद से साइकिलों की बिक्री के आंकड़ो में अहम बदलाव आया है। साइकिलों की कुल बिक्री में बढ़ोतरी आई है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में इसकी बिक्री में गिरावट आ रही थी। आसान आर्थिक प्रायोजन की बदौलत लोग मोटरसाइकिल को इन इलाकों में ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। दरअसल, 1990 से पहले जो भूमिका साइकिल की थी, उसकी जगह गांवों और शहरों में मोटरसाइकिल ने ले ली।

2002-03 में दोपहिया गाडि़यों की बिक्री (स्कूटर, मोटरसाइकिल, मोपेड, बिजली से चलने वाले दोपहिए) जहां 48.12 लाख थी, वह 2008-09 में बढ़कर 74.37 लाख हो गई थी। इसका मतलब यह है कि पिछले कारोबारी साल में देश में जितनी साइकिल बिकीं, उतनी ही बिक्री दोपहियों (स्कूटर, मोटरसाइकिल, मोपेड, इलेक्ट्रिक टू व्हीलर) की भी रही।

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