मनुष्य जीवन में धर्म का होना क्यूँ जरुरी है/Dharm ka hona kyu jaruri hai

धर्म,दर्शन , अध्यात्म और  मोक्ष जीवन के मूल तत्व हैं। धर्म, कर्त्तव्यनिष्ठता का परिचायक है। दर्शन, जीवन जीना सिखाता है। सत्यता के मार्ग पर चलकर अध्यात्म, ही मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है।

सांसारिक प्राणी आखिर एक प्रश्न में  उलझता चला जाता है कि धर्म को सही अर्थों में  परिभाषित कैसे किया जाये? मनुष्य का वास्तविक धर्म क्या है?मनुष्य जीवन में धर्म का होना क्यूँ  जरुरी है?(Dharm ka hona kyu jaruri hai?)  इन  सभी प्रश्नों का पूर्ण रुप से विवेचन किया जायेगा, इस आर्टीकल में।

इस संवेदनशील विषय पर कुछ भी लिखने से पहले ,कहना चाहते हैं कि सबकी भावनाओं का सम्मानपूर्वक अभिनंदन करते हैं ,हम और किसी भी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का हमारा कोई भी इरादा नहीं है। सही और ज्ञानवर्धक जानकारी हेतू इस विषय पर लिखने का एकमात्र प्रयास है, जो हर किसी के मन  की उलझन को दूर कर सकें।

“अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च:“

जिसका अर्थ अहिंसा ही परम धर्म है पर धर्म की रक्षा के लिए कि गयी धर्म हिंसा उससे भी बड़ा धर्म है। 

धर्म क्या है/ धर्म की परिभाषा

 1.धर्म क्या है

कहते हैं, धर्म ना मंदिर है, ना मस्जिद, ना गुरुद्वारा, गिरिजाघर। धर्म ना गीता है, ना कुरान, ना ग्रंथसाहिब,ना बाईबल ।धर्म ना धूप है, ना अगरबत्ती ।

धर्म ना हरिद्वार है, ना मक्का, ना रोम, ना अमृतसर। धर्म ना सुन्नत है, ना जनेऊ। धर्म ना दण्डवत है, ना हज, ना गंगा में  डुबकी। धर्म सत्य है, धर्म ईमान है, धर्म बन्धुत्व है धर्म कर्त्तव्य है।

                

धर्म का अर्थ मंदिर या मस्जिद से नहीं है, धर्म का अर्थ कर्त्तव्य से है। यदि हर व्यक्ति अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं  करेगा, सारे समाज का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा।

2.धर्म की परिभाषा     

सही अर्थों में  धर्म की परिभाषा को समझना आसान नहीं होगा। वेदों, पुराणों, उपनिषद , और  श्री मदभगवत गीता में  भी धर्म को विभिन्न शब्दों में  परिभाषित किया गया है।

       धारयति इति धर्म:–धर्म का अर्थ है, धारण करना।

प्रशं उठता है कि क्या धारण करना चाहिये? जो धारण करने योग्य हो, उसे धारण करना चाहिये। एक प्रशं उठता है कि क्या धारण करने योग्य है? जो धर्मग्रन्थो ने कहा, सत्य, विद्या, दान , दया और क्षमा  धारण करने योग्य है।

अर्थात सत्य, विद्या, दान,क्षमा, दया सभी धर्म है और हम सभी को ये धारण करना चाहिये ।गीता में  भगवान श्री कृष्ण जी ने कहा है कि  ये धर्म है, ये अधर्म है, अर्थात ये धारण करने योग्य हैं।

ये धारण करने योग्य नहीं  है। यहाँ धर्म का तात्पर्य धार्मिक मान्यताओं से नहीं है, बल्कि हमारे कर्त्तव्य से है। तभी सवाल उठता है कि मनुष्य जीवन में  धर्म क्यूँ  जरुरी है? (dharm ka hona kyu jaruri hai?) धर्म की सबसे बड़ी बात यही है कि हर व्यक्ति को जिम्मेदार बनाने  की बात करता है।और  यही कारण है, कि मनुष्य को अपने धर्म का पालन करना चाहिये।

जो भी इस समाज में हैं, उनका एक धर्म होता है। उदाहरण के लिये, पेड़  का धर्म है, छाया और  फल देना।नदी का धर्म है,जीवनदायी जल बनकर बहते रहना।बादलों का धर्म है, जल बरसाना। सूर्य का धर्म है,प्रकाश देना। उसी प्रकार मनुष्य का धर्म है अपने कर्तव्यों का निर्वाहण करना।

धर्म कितने प्रकार के है/ मानव धर्म क्या है?

Dharm ka hona kyu jaruri hai

धर्म के प्रकार:‐

सनातन धर्मों के अनुसार धर्म का अर्थ है, धारण करना। जैसा की अभिव्यक्त किया गया है। और ध्यान से चिंतन किया जाये तो समझ पायेंगे कि हमारे पास धारण करने के लिये दो चीजें हैं, 1.आत्मा 2.शरीर।

हम आत्मा हैं पर  कर्म करने के लिये आत्मा को शरीर की आवश्यकता होती है। इसलिये ये आत्मा और शरीर दो है और  धर्म भी दो प्रकार के हैं।अब प्रश्न है कि धारण करने वाला कौन है? और इसका उत्तर है “मन “।

क्योंकि ब्रह्मबिन्दुपनिषद 2 ने कहा,

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो

(मन  ही सभी मनुष्यों के बंधन एव मोक्ष का प्रमुख कारण है।)

इसलिये मन द्वारा ही कर्म होता है। दोनों  प्रकार के धर्मों को मन ही धारण करता है। इस प्रकार वेदों में  दो प्रकार के धर्मों का वर्णन है.आत्मा के लिये:-आत्मा का धर्म है, परमात्मा को धारण करना

अर्थात आत्मा के लिये भगवान धारण करने योग्य है।क्योंकि परमात्मा, आत्मा और माया ये तीन तत्व हैं और आत्मा परमात्मा का अंश है माया का नहीं।

इसमें किसी प्रकार की कामना नहीं  रहती, नित्य निरंतर होती है और अपरिवर्तनशील है।किसी भी समय आत्मा के धर्म का त्याग नहीं  करना है।हर इन्सान को भगवान की भक्ति में  संलग्न रहना चाहिये।

शरीर के लिये शरीर का धर्म है, माया को धारण करना।परमात्मा,आत्मा और  माया इन तीन तत्वों में, शरीर माया का अंश है जो संसार मे लिप्त रहता है। और  शरीर पंचतत्वों से मिलकर बना है।इसलिये संसार अच्छे से चले, इसके लिये ग्रंथों ने कहा है कि  शरीर क्या धारण करे।जिसे हम वर्णाश्रम धर्म के नाम से जानते हैं

वर्ण अर्थात ब्रहामण,क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आश्रम अर्थात ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास।

इस तरह ये जानना आवश्यक है कि मनुष्य जीवन में धर्म का होना क्यूँ जरुरी है?(dharm ka hona kyu jaruri hai?)शरीर परिवर्तनशील है और उम्र व आश्रम के अनुसार धर्म भी परिवर्तन शील है।शरीर पंचतत्व से बना है और शरीर को पंचतत्व धारण करने होंगे, जब तक शरीर इस संसार मे है।

वेदों में  जितने भी अलग-अलग धर्म बताये गये हैं, उनमें से सभी या तो आत्मा को धारण करने वाले होंगे या शरीर को धारण करने वाले होंगे।

मानव धर्म क्या है?

सनातन धर्मों में  कहा गया है कि मानव को सत्य, दया, विद्या, क्षमा और  उदारता को धारण करना चाहिये।यही मानव के सच्चे धर्म है।सांसारिक मनुष्य का परम धर्म है,उदार एवं सदाचारी होना व सद्धव्यवहारी होना।

सदाचार और  सद्धव्यवहार  में  सब शामिल है, कर्म, धर्म नीति, ज्ञान। संसार को क्रियाशील और शांतिमय बनाने के लिये सदाचार अति आवश्यक है और मनुष्य का परम धर्म है।

संसार में चार तरह के वर्ण हैं। इस प्रकार इस शरीर का धर्म है वर्णाश्रम धर्म का पालन करना, तभी यह संसार सुव्हरु रुप से चल पायेगा। भगवान की भक्ति और  सदाचारिता  का पालन करना हर मनुष्य का धर्म है।

धर्म के कितने चरण हैं?

कर्त्तव्यनिष्ठा या धर्म का पालन करते हुए जीवन को अर्थपूर्ण बनाना ही मनुष्य का परम धर्म है। धर्म का मार्ग नामुमकिन तो नहीं ,  स्वच्छ मन  और  त्याग की भावना से हर इन्सान अपने जीवन को सफल बना सकता है।धर्म के मार्ग पर चलने वाले, धर्म के चार चरणों से गुज़रते है, तभी शांतिमय जीवन की प्राप्ति होती है।

1.सत्य‐ धर्म के चार चरणों  में  सबसे पहला चरण है, “सत्य”!  सदाचारी होना हर मनुष्य का परम धर्म है। कलयुग में  सत्य का वज़ूद ही गायब होने लगा है।

झूठ का ही बोलबाला है। जिसके कारण सारे विश्व में  अहिंसक और अशांति का वातावरण है। हर मनुष्य का धर्म है की सच की रह पर चले। सदाचारिता ही मनुष्य का परम धर्म है।

हर व्यक्ति को सत्य का साथ देना चाहिये।लेकिन यह भी सत्य है कि किसी की भलाई के लिये बोला गया झूठ भी सत्य के समान ही है। अर्थात परिस्थिति के अनुसार, सत्य की परिभाषा भी बदल जाती है।

2.पवित्रता: धर्म का दूसरा चरण है,”पवित्रता”। दो शब्द हैं, स्वच्छता और पवित्रता। दोनों शब्दों का अर्थ भिन्न है। स्वच्छता से अभिप्राय, शारीरिक सफाई और अपने आस पास की सफाई से है।

जबकि पवित्रता से अभिप्राय मन  और  सोच का शुद्ध होना है। अपने मन  को हिंसा, ग्लानि, नफरत इन  सबसे दूर  रखें  यही मनुष्य का परम धर्म है।

अपनी सोच को सकारात्मक रखना, सबके लिये अच्छा सोचना भी पवित्रता है। शारीरिक और  मन की पवित्रता हर मनुष्य के लिये आवश्यक है।

जगत मे शान्ति ओर भाईचारे का उदगम होगा। शुद्धतम वातावरण का सृजन होगा, जो हर मनुष्य की शान्ति के लिये अत्यंत आवश्यक है।

3.तप:– धर्म का तीसरा चरण है, “तप”। तप का अर्थ है तपस्या..! वेदों, ग्रंथों, पुराणों में  वर्णन किया गया है उन महान ऋषि-मुनियों का जिन्होनें  सदियों तक घोर तपस्या की।घने जंगलों में, पहाडों पर  पूरी उम्र गुज़ार दी, भगवान को प्राप्त करने के लिये, मोक्ष प्राप्त करने के लिये।

परंतु आज के युग में  यह संभव नहीं। तभी इन्सान खोजता है कि आखिर मनुष्य के जीवन में धर्म का होना क्यूँ  जरुरी है?(dharm ka hona kyu jaruri hai?) जिसका जवाब हम आसाँ बना सकते हैं।

आज हर मनुष्य का धर्म है कि शुद्धतम विचारों व त्याग की भावना के साथ जगत के कल्याण में  लगे रहें। यही बहुत गहरी तपस्या है, प्रभू को प्राप्त करने का एकमात्र उपाय।

4.दया:- धर्म का आखिरी  चरण है, “दया”। हर मनुष्य के हृदय में  दयाभाव, दान  की भावना, सहायता करने की इच्छा जरुर होनी चाहिये।

अपने सदाचार और  सदभावना से अपने धर्म का पालन कर सकता है। मन  में  दूसरों के लिये दया का भाव, इन्सान को इन्सान बनाता है, प्रभू के करीब लाता है।

मन  को शुद्ध करता है। प्रेम, सत्य, अहिंसा के मार्ग पर  चलकर जगत का कल्याण होगा। और यही मानव का परम कर्त्तव्य है।

धर्म/आस्था की उत्पत्ति कैसे और क्यूँ हुई?

                       

धर्म की उत्पत्ति कैसे हुई? यह जानने के लिये हमें  प्राचीन कल में रहने वाले मानव के बारे में जानना होगा। प्राचीन कल में मानव घने जंगलों, नदी के किनारों, गुफाओं में  जंगली जानवर की तरह रहता था।

प्राकृतिक आपदाओं से बहुत घबराता था।बाढ़, सैलाब, तुफाँ, बिजली का चमकना उसे डरा जाते थे।यही डर  धीरे-धीरे उसके अन्धविश्वास बनने लगे। अब वह सामाजिक प्राणी बन चुका था। कुप्रथाओं और परम्पराओं ने उसे निर्दयी बना दिया।

इन आपदाओं से बचने के लिये वह जानवरों, बच्चों की बलि देने लगा। समाज में  हिंसकता और  पाप बढ़ चुका था।ऐसे ही समाज में कुछ ज्ञानी सन्त लोगों ने पाखंड के खिलाफ आवाज़ उठाई।

ऐसे लोग मसीहा के रुप में  दिलों में  रहने लगे। लोगों को सही रास्ता दिखाने लगे।और आगे चलकर इन मसीहाओं के नाम पर  प्रथायें

बनती चली गई , जिन्होंने धर्म का रुप ले लिया। इस प्रकार कईं धर्मों का जन्म हुआ। सभी के अलग अलग प्रथायें और  नियम बन  गये।

अंधविश्वास भी बढ़ता चला गया। सवाल फिर यही है, मनुष्य के जीवन में  धर्म का होना क्यूँ  जरुरी है? (dharm ka hona kyu jaruri hai?) उत्तर के तौर पर  पर यही कहा जा सकता है कि  सच्चा ज्ञान और  सही मार्ग दर्शन ही मनुष्य का जीवन सफल बनाएगा, और  वह मार्ग है धर्म का मार्ग।

धर्म और विज्ञान/ आस्तिक और नास्तिक

Dharm ka hona kyu jaruri hai

धर्म को मानने वाले आस्तिक हैं या विज्ञान को मानने वाले नास्तिक। कौन सही, कौन गलत कहना मुश्किल है।आज हमारे समाज में दो तरह के लोग रहते हैं, जो भगवान और धर्म में विश्वास रखते हैं।

और दूसरे वो जो विज्ञान में  विश्वास रखते हैं। ईश्वर, धार्मिक विचार, दार्शनिक विचारधारा को मनाने वाले लोग आस्तिक कहलाते हैं।कुछ विद्वानों और ऋषि मुनियों ने जो ज्ञान हासिल किया, उसके आधार पर वेद,ग्रंथ, उपनिषद आदि लिखे गये और वही समाज के नियम बन गये।कहा गया कि इन वेदों ग्रंथों इत्यादि में  लिखी हर बात ईश्वर ने कही है।

जबकि वैज्ञानिकों का मानना है कि किताब लिखने वाले इन्सान ही थे।वेदों, ग्रंथों में  सूर्य, चंद्रमा, राहु, केतु को ग्रह कहा गया जबकि वैज्ञानिक विचारधारा के अनुसार राहु, केतु का नां कहीं नहीं  है ,ग्रहों में । इस प्रकार ऐसी कईं बातें कही गई जिसे धर्म और विज्ञान एक दूसरे के विरोधी बन गये।

लोगों के मन में प्रश्न उठा,मनुष्य जीवन में धर्म का होना क्यूँ जरुरी है?( Dharm ka hona kyu jaruri hai?) लोगों में  धर्म के प्रति गहन विश्वास होने के कारण ईश्वर में ही आत्मा का अस्तित्व कायम रहा।

लेकिन इस विरोधात्मक प्रतिक्रिया का शिकार पूरा  संसार होगा। जानना अति आवश्यक है कि  कौन सही, कौन  गलत। हालाँकि ईश्वर के प्रति आस्था को कोई नहीं  हिला सकता।

धर्म के नाम पर गलत विचारधारा

Dharm ka hona kyu jaruri hai

                      

सनातन धर्मों के अनुसार धर्म का अर्थ धारण करने से है, अपने कर्तव्यों का पालन करने से है। हमारे देश में धार्मिकता रगों में  बहती है। धर्म के नाम पर अन्धविश्वास बड़ी ही आसानी से फैलाया जा सकता है। ऋषि-मुनियों की धरती कहा जाने वाला हमारा हिंदुस्तान धार्मिक मान्यताओं पर तुरंत भरोसा कर लेता है।

मान्यताओं के आधार पर धर्म को बाँट दिया गया जैसे हिंदू धर्म, सिक्ख धर्म, जैन धर्म, मुस्लिम धर्म इत्यादि। परंतु ये धर्म नहीं बल्कि धर्म के आधार पर सम्प्रदाय बना दिये गये जिनकी अपनी ही अलग मान्यतायें हो गई। और लोग इसी को धर्म समझने लगे।

धर्म और  सम्प्रदाए अलग अलग चीज़ हैं।धर्म की बुनियाद प्रेम है,करुणा है, अहिंसा है, मैत्री है।धर्म मुक्त करता है, सम्प्रदाय बंधन में डालता है।

धर्म दीवारें हटाता है, सम्प्रदाए दीवारें खड़ी करता है।यही कारण है आज मुसलमान तो है, लेकिन मुहोम्मद साहब का भाईचारा कहाँ है??ईसाई तो है लेकिन ईशू का प्रेम कहाँ? जैन तो हैं किन्तु भगवान महावीर जी की अहिंसा और प्रेम कहाँ? बोद्ध तो हैं परंतु भगवान बुद्ध की करुणा कहाँ?सनातनी तो हैं,परंतु भगवान राम की मर्यादा कहा??

सम्प्रदाए के केवल लेबल लगे हैं, जीवन में  धर्म कहाँ है?तभी यह सवाल भी गलत ना होगा कि मनुष्य जीवन में धर्म का होना क्यूँ जरुरी है? (Dharm ka hona kyu jaruri hai?) धर्म  का असली मतलब ही ब्जग्वं से मिलन करवाता है। सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

निष्कर्ष( Conclusion)

                        

अपना कर्त्तव्य निभाना ही धर्म है। धर्म का सही अर्थ धारण करने से है। सत्य, दया, दान,विद्या और उदारता, यही धारण कर्ण चाहिये हर मनुष्य को।

अन्धविश्वास और  शुद्ध ज्ञान को भली भान्ति समझना चाहिये। हर धर्म का पालन करते हुए, सदाचारी और  सद्वव्यवहार को आचरण में  लाना चाहिये।सही मायने में यह सवाल ही सबसे महत्तवपूर्ण है कि मनुष्य के जीवन में  धर्म का होना क्यूँ  जरुरी है? ( dharm ka hona kyu jaruri hai?) यही प्रश्न मनुष्य के जीवन को स्थाई बनाता है।

                        इससे ऊपर एक और  बात कही जा सकती है कि  पूरे  समाज में, सम्पूर्ण  इंसानी जाति  में  इंसानियत ही एक ऐसा धर्म है जिसका पालन हर एक मनुष्य को करना चाहिये। सम्पूर्ण विश्व में  प्रेम, अहिंसा व भाईचारे का वातावरण विकसित होगा।

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