कर्म और धर्म में क्या अन्तर है|Dharm or karm me kya anter hai?

What is difference between dharma and karm?

आध्यात्मिकता (Spirituality) के आधार पर  इस समाज(Society)में  रहने वाले हर मनुष्य को कर्म करना  ही पड़ता है। साथ ही धर्म का पालन भी जीवन आधार है।धर्म और  कर्म से सम्बन्धित अनेक प्रश्न इन्सान को उलझा देते हैं।

धर्म क्या है? कर्म क्या है? धर्म और कर्म में  क्या अंतर है?(Dharm or karm me kya anter hai?)आइये इन प्रश्नों को समझने की कोशिश करते हैं।

कर्म और धर्म में क्या अन्तर है?

सबसे बड़ा प्रश्न है कि  कर्म और धर्म में  क्या अंतर है? ( karm or dharm me kya anter hai?)धर्म,  जो आत्मा और शरीर के द्वारा धारण किया जाता है। और कर्म जो हर मनुष्य के लिये करना  आवश्यक है।

धर्म, पुण्य और सकाम कर्म करने की प्रेरणा देता है, जिससे सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है।अपना कर्त्तव्य निर्वाहण सही तरीके से करना ही धर्म(Religion है।

जीवन में  विवेक की चेतना जागृत होना धर्म(Religion)है। जबकि कर्म अच्छे या बुरे हो सकते हैं।धर्म, सही मार्ग पर चलकर सत्यवादिता और उदारवादिता को बढ़ावा देता है।जबकि अच्छे, बुरे कर्मों का फल मनुष्य को भोगना ही पड़ता है।

 धर्म, निष्काम कर्म करने की प्रेरणा देता है ताकि कर्मयोग से मोक्ष की प्राप्ति हो सके। अर्थात जन्म,-मरण के बंधनों से मनुष्य को छुटकारा मिल जाता है।

धर्म के अनुसार मनुष्य को सत्य, क्षमा, विद्या, दया इत्यादि को धारण करना चाहिये। इसके विपरीत प्रारब्ध कर्मों को मनुष्य को भुगतना ही पड़ता है।

 

कर्म, धर्म का ही मूल अंश है। पुण्य कर्म या सकाम कर्म ही सत्य का मार्ग दिखाते हैं। कर्मयोग , मोक्ष का प्रतीक है।धर्म , हर इन्सान को ज़िम्मेदार बनाने की बात करता है।अच्छे, बुरे कर्मों का परिणाम दर्शाता है।

अपने जीवन में  धर्म और कर्म को लागू करना.

Dharm or karm me kya anter hai

जब तक हम धर्म और  कर्म के महत्ता को नहीं  जानेंगे, हमारा जीवन काल से साक्षात्कार  संभव ही नहीं  है। सबसे पहले समझना होगा, जीवन के मुख्य तत्व, जो हमारी जीवन शैली को प्रभावित करते हैं।

1.समय(Time)

2.जगह(Space)

                             LIFE

                           /         /

                    TIME.      SPACE

                 (LENGHT)   (BREADTH)

   अर्थात Time और Space life के लम्बाई और चौड़ाई हैं।

               हर इन्सान का जीवन दो दिशाओं में  बढ़ता है।

पहला है :- समय अर्थात lenght(लम्बाई)।

 उदाहरण के तौर पर कहा जा सकता है कि  अपनी उम्र को बढ़ाना, अपने सालों को बढ़ाना  या अपनी उम्र लम्बी करना।योगा, व्यायाम, सही भोजन इत्यादि की सहायता से हम अपनी उम्र बढ़ा सकते हैं।

  

दूसरा है:-  जगह अर्थात Space! अर्थात चौड़ाई ज़िंदगी की।

इसके अंतर्गत हमारी जायदाद, हमारी तरक्की या हम कितना पैसा कमाते हैं।..ये सब हमारी ज़िंदगी को चौड़ाई देता है।

 

वेदों, गर्न्थो  के अनुसार, रावण ने अपना साम्राज्य बढ़ाया, जो space के अंतर्गत आता है। हिरणकश्यप ने अमर होने के लिये सालों तक तपस्या की।जो Timeअर्थात लम्बाई के अंतर्गत आता है।

 परंतु इन्सान चाहे कितने ही प्रयोजन कर ले, धर्म और  कर्म के अनुसार, जो निर्धारित है, आखिर में हमारे पास ही आने वाला है। अर्थात अपने कर्म हमें भुगतने ही होंगे।

 

इसके बावजूद, हम अपनी ज़िंदगी को अर्थपूर्ण बना सकते हैं, अपने धर्म का पालन करके , अच्छी सोच के साथ, सही कर्मों का अनुसरण करके।

 अपनी ज़िंदगी की गहराई (Depth of life)को पा सकते हैं।

जरुरी ये नहीं  है कि  कितनी सफलता प्राप्त की या कितनी लम्बी उम्र मिली, जरुरी है, जीवन की गहराई कितनी है, Depth कितनी है?अपने धर्म का सही तरीके से निर्धारण करना  और  पुण्य कर्म करना ही जीवन की Quality है।

क्या भेद हैं, धर्म और  कर्म में(Dharm or karm me kya antar hai)?

ये जरुरी नहीं  है। अच्छी सोच से दोनों का निर्वाह करना Important है।

 Don’t go for increasing the length  and breadth of our life. Let’s  go deeper. Let’s make our life more meaningful.

 कहते हैं ना, मरने के बाद रिश्तेदार वसीयत(Length  and breadth of our life)देखते हैं  और  ईश्वर इंसानियत(Depth of life)देखता है।

 कर्म के 12 नियम क्या हैं?

1.श्री मदभगवत गीता में कहा गया है, कि जैसा कर्म करेगे, वैसा ही फल प्राप्त होगा। (For every action, there is an equal and opposite reaction. )

2.शरीर, मन  व वाणी से की गई क्रिया,कर्म कहलाती है।हर समय , हर पल इन्सान कर्म में  विलीन रहता है।

3.law of karma इस जीवन चक्र(Life cycle)में  ही नहीं, मृत्यु(Death) के बाद भी apply  होता है।

4.मृत्यु के बाद भी पिछले जन्मों के संचित कर्म साथ  चलते हैं  और अगले जन्म(Birth) में प्रारब्ध का रुप लेते हैं।

5.law of karma, भक्ति अर्थात Spiritual  world में apply नहीं  होता। Bhakti is beyond karma. भक्ति पूरी तरह से दिव्य- क्रियाकलाप है, जो भगवान से प्राप्त होती है।

6.कर्मों के आवागमन अर्थात प्रारब्ध से छुटकारा पाने के लिये भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है। ईश्वर की शरण में  आओ। जो भाग्य(Destiny) के tight knots को  untie कर सके।

अर्थात भाग्य के बंधन से मुक्त हो पायें।यही **कर्म और धर्म का मुख्य भेद है(karm or dharm me bhed) जो धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

7.श्री मदभगवत गीता  के अनुसार अच्छे कर्मों का अच्छा फल और बुरे कर्मों का बुरा फल मिलता है।

8.पिछले जन्म के संचित कर्मों में  से कुछ कर्म प्रारब्ध कहलाते हैं, जिन्हें हमें  पाप-पुण्य के अनुसार भोगना ही पड़ता है।

9.क्रियमाण कर्मों के प्रताप से प्रारब्ध कर्मों का प्रभाव कम हो जाता है। अर्थात वर्तमान के अच्छे कर्म, प्रारब्ध काटते हैं और वर्तमान के बुरे कर्म प्रारब्ध बढ़ाते हैं।

10.सकाम कर्म अर्थात अच्छे और पुण्य कर्म करने से सुख और  खुशहाली में  वृद्धि होती है।और स्वर्ग (Paradise)प्राप्त होता है।

11.कर्मयोग अर्थात बिना किसी कामना और निष्फल मन  से किये गये कार्यों से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

12.आत्मिक रुप से(Spiritually)मोक्ष (Moksha)की प्राप्ति होने से जन्मों का बंधन समाप्त हो जाता है।

धर्म के नियम/ लक्ष्य क्या हैं?

धर्म के नियम

1.धर्म, शरीर और आत्मा से की गई क्रियायें  हैं,जो जीने की राह प्रशस्त करती हैं।

2.जीवन में  विवेक की चेतना का जागृत हो जाना धर्म है।

3.धर्म सत्य, दान,दया, विद्या, क्षमा को धारण करने वाला है।

4.धर्म, का अर्थ कर्त्तव्यों का पालन करने से है, जैसे बादल का धर्म है बरसना, वृक्षों का धर्म है छाया, फल देना।

5.धर्म मनुष्य को  सदाचारी  और उदारवादी होने की प्रेरणा देता है।

6.सदाचार और  सदव्यवहार में  कर्म, धर्म, नीति,ज्ञान सब शामिल है।

7.कर्म और  धर्म में भेद (karm or dharm me bhed)नहीं  है।कर्म में  लगे रहना धर्म है अर्थात कर्म में लगे रहना धारण करने योग्य है।

8.धर्म के नियम के अनुसार सकाम व पुण्य कर्म करें जिससे सुख और  खुशी की प्राप्ति होती है।

9.कर्म, धर्म का मूल अंश है। कर्म के बिना धर्म संभव नहीं।

10.धर्म हर मनुष्य को निष्काम कर्म करने की प्रेरणा देता है, ईश्वर की भक्ति की प्रेरणा देता है ताकि सारा संसार खुशहाल हो सके।

धर्म का लक्ष्य

सनातन धर्मों में  कहा गया है कि सत्य, विद्या, दया, दान, उदार होना ही धर्म है।उदारता धर्म है अर्थात उदारता धारण करने योग्य है।

दया धर्म है अर्थात दया धारण करने योग्य है। मन में  सवाल उठता है कि क्यों धारण करना  चाहिये, सत्य, दया, दान, विद्या और उदारता को?

              

अगर मानव इनको धारण नहीं  करेगा, तो संसार में झूठ, अज्ञानता और हिंसा का बोलबाला होगा। चारों और कुकर्मों से जगत का विनाश होगा। इन्सान, हैवान बनता जायेगा, अराजकता का राज होगा।

                 

इसलिये हर मनुष्य का धर्म का पालन कर्ण अत्यंत आवश्यक है।जिससे संसार में  इंसानियत कायम रहेगी और  हर तरफ़ शान्ति और प्रेम का माहौल होगा।

               

इसलिये यही कहा जा सकता है**,कर्म और धर्म का फ़र्क (karm or dharm ka fark)चाहे जो भी हो परंतु हमारे कर्म धर्म का ही एक हिस्सा है। जिस पर सारी मानव जाति का कल्याण निर्भर करता है।

             

श्री मदभगवत गीता में  भी ये प्रवचन(preach) शामिल हैं कि सत्य और उदारता के मार्ग पर  चलकर हर मनुष्य , नेक सन्त( Righteous priest) की भूमिका निभा सकता है, जिसका धर्म सिर्फ़ इंसानियत है। निष्काम कर्म की श्रेणी में  मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

क्या कर्म, प्यार में  आता है?

       

हमारी ज़िंदगी में  आने वाले लोगों को भी क्या हमारी किस्मत ही निर्धारित करती है? क्या प्यार भी भाग्य से मिलता है? क्या प्रेम की डोरियाँ भी ईश्वर ही बाँधता है? क्या हमारे जीवन में आने वाले लोग भी एक संयोग हैं?

             

ऐसे कुछ प्रश्न, जो हर किसी के मन को उलझाकर रख देते हैं। सरल विधि से समझने का प्रयास करते हैं कि हमारे जीवन में आने वाले लोगों का हमारे भाग्य से क्या जुड़ाव है?

          

श्री मदभगवत गीता में कहा गया है कि  हमारे जीवन में होने वाली हर घटना हमारे संचित कर्मों या प्रारब्ध पर निर्भर करती है। और इन्हीं कर्मों का फल है, हमारे जीवन में  लोगों का प्रवेश।

              

परंतु गीता में एक बात और कही गई है, प्रारब्ध के अनुसार हमार जुड़ाव लोगों से जरुर होता है परंतु रिश्ते को संभालने के लिये हमारे क्रियमाण कर्म ज़िम्मेदार होते हैं।

            

हमारे वर्तमान में किये गये कर्मों का प्रभाव भी प्रारब्ध पर पड़ता है।हम अपनी किस्मत बदल भी सकते हैं अपने कर्मों से।रिश्ता बनाये रखना हर इन्सान के कर्मों पर निर्भर करता है।

             

कहा भी गया है कि ईश्वर हर इन्सान को जोड़ियों में भेजता है, परंतु हर रिश्ते को संभालकर रखना पूरी तरह से इन्सान पर  निर्भर करता है।

धर्म,कर्म से कैसे सम्बंधित है?

Dharm or karm me kya anter hai

   

कर्म, धर्म का मूल है। कर्म के बिना धर्म संभव नहीं। कर्म करना अनिवार्य है,परंतु कर्म के साथ धर्म नहीं  छुटना चाहिए।

             

जगत में  हर इन्सान के लिये कर्म करना अति आवश्यक है। धर्म सही कर्त्तव्य परायणता के साथ कर्म करने की प्रेरणा देता है।

              

रामायण के अनुसार, भगवान राम ने छुपकर बाली का वध किया था। दशानन रावण की मृत्यु के लिये उसके भाई विभीषन की सहायता ली थी। कहने को तो बाली और रावण का वध अनैतिक(Immoral) और अधर्म(Adharm) माना गया।

              

परंतु, जिस छल का आशय धर्म है, वह छल भी धर्म है। कर्म चाहे कैसा भी हो लेकिन उसकी प्रकृति निर्धारित करती है, उसका परिणाम। और उसका परिणाम ही धर्म को सूचित करता  है।

                     

कईं प्रश्न उठते हैं ज़हन में, धर्म और कर्म में क्या अंतर है?(Dharm or karma me kya anter hai?)गहन अध्ययन से ही धर्म और कर्म के बीच तालमेल को समझ पायेंगे।

                

उदाहरण के लिये, एक छोटी से कहानी को समझने की कोशिश करते हैं। एक बार , एक पतिव्रता स्त्री अपने पति की सेवा में  संलग्न थी। शाम को थका हुआ आया उसका पति उसकी गोद में  ही सो गया।

काफ़ी समय तक वो ऐसे ही बैठी रही। उसका दो साल का बच्चा ज़मीन पर खेल रहा था। धीरे-धीरे सरकता हुआ हवन कुंड की और जाने लगा जिसमें अभी भी अग्नि थी।

वो स्त्री सब देख रही थी, परंतु वह उसे रोक नहीं पाई ताकि उसके पति की नींद ना टूट जाये। आखिरकार बच्चा हवन कुंड में  गिर गया।

                 

उस समय पतिव्रत धर्म था उस स्त्री का और बच्चे को संभालना कर्म। उस स्त्री ने धर्म के लिये कर्म का बलिदान कर दिया।

              तभी धर्म-शास्त्रों(Scriptures)में कहा गया है कि कर्म करो लेकिन धर्म ना छूटने पाये।

निष्कर्ष (CONCLUSION)

          

आपका जीवन आपने खुद बनाया है।इसका मतलब है कि अपने भाग्य(Destiny)की यात्रा मनुष्य स्वयं तय करता है। कर्मों की प्रकृति ही निर्धारित करती है, मनुष्य के जीवन का सफ़र।

                  

कर्म और  धर्म में  क्या अंतर है?(dharm or karm me kya anter hai? इस सवाल को भली-भाँति समझकर, अपने जीवन में  निष्काम कर्मों को करते हुए, पूरी कर्त्तव्य निष्ठा से अपने धर्म का पालन करें।

            

अपने जीवन को उच्चतम सोच और विचारों से खुशहाल बनायें। एक बात हमेशा याद रखियेगा, इंसानियत से बढ़कर कोई धर्म नहीं।जो हकीकत है, वही सत्य है। परंतु ज्ञान प्राप्त करना भी कम मूल्यवान नहीं। सही सोच के साथ अपने धर्म का पालन करते हुए अपने जीवन-पथ पर अग्रसर रहें।

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