Jeevan mai karm Mhatv |Importance of karma in life in Hindi

Importance of karma in life पृथ्वी पर जन्म (Birth) लेने वाले हर मनुष्य का धर्म है, कर्म करना। कर्म क्या है(what is karma?), एक आम इन्सान की भाषा में कहा जाये तो काम करना ही कर्म है। परंतु कर्म महज़ एक छोटा सा शब्द नहीं,बल्कि सारी कायनात का अस्तित्व धारण किये हुए है।

वेदों, पुराणों, ग्रंथों में मनुष्य के भाग्य(Destiny) का लेखा-जोखा उसके कर्म में ही निहित है। आइये आध्यात्मिकता के आधार पर (On the basis of spirituality)कर्म को समझने की कोशिश करते हैं। जीवन में कर्म का क्या महत्त्व है?

जीवन में कर्म का महत्त्व क्या है?

संक्षेप में कहा जाये तो,जो मनुष्य छोटे-छोटे कार्यों को ईमानदारी से करता है, वह हर कार्य को छोटा हो या बड़ा, ईमानदारी और निष्फल रुप में करेगा।

वही कार्य सबसे अच्छा है,जिससे बहुसंख्यक लोगों को अधिक से अधिक आनन्द प्राप्त हो।

कर्म का आध्यात्मिक अर्थ.

महाभारत में कहा गया है, कि हजारों में कोई एक ही होगा जो कर्म को अच्छी प्रकार से करना जानता होगा।श्री मदभगवत गीता के अनुसार, कोई भी मनुष्य,किसी भी अवस्था में क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता।इसका मतलब है कि मनुष्य हर क्षण कोई ना कोई कर्म कर रहा होता है।

अर्थात हम चार तरीके से कर्म करते हैं ‐

* विचारों(Thoughts)के माध्यम से

*शब्दों(Words के माध्यम से

*क्रियाओं(Actions) के माध्यम से

*उन क्रियाओं के माध्यम से, जो हमारे निर्देश पर दूसरे करते हैं

दूसरे शब्दों में,हमारा सोचना,उठना,चलना,बोलना,खाना, सोना कुछ भी करना,सभी कर्म के अंतर्गत आते हैं।गीता के अनुसार, शरीर,वाणी और मन से की गई क्रिया कर्म है।

जीवन में कर्म का होना क्यों जरुरी है .

इस संसार में कोई भी मनुष्य, किसी के लिये स्वभावतः उदार,प्रिय या दुष्ट नहीं होता। अपने कर्म के अनुसार ही मनुष्य गौरव अथवा पतन का सहभागी होता है।

कर्म विचारों की प्रतिलिपि है।इसलिये अपने मस्तिष्क में उच्चतम और शुद्धतम सोच(Pure thoughts)को स्थान दें। वही मनुष्य के कर्म के आदर्श(Idle)बनेंगे, और वही महान कर्मों को जन्म देंगे।

केवल वही व्यक्ति, दूसरों की उपेक्षा, उत्तम रुप से करता है, जिसका मन निश्छल हो। ना धन की लालसा, ना कीर्ति की और ना ही अन्य वस्तु की।

निष्काम कर्म करने वाला,कभी अपने अहित करने वालों का बुरा नहीं चाहेगा, और ना ही उनसे प्रभावित होगा।कर्म का मूल्य कुछ प्राप्त करने में नहीं है,अपितु अपने अन्तर्मन में उत्पन्न हुई दिव्यता की वृद्धि से है, जो सच्चा कर्म(True karma) है और सच्चे जीवन(True life) का उदाहरण भी।और यही हमारे जीवन के प्रबंधन में कर्म का महत्त्व दर्शाता है।

हिन्दू धर्म में कर्म का महत्त्व (Importance of karma in Hindu Dharma)

Importance of karma in life

कर्म ,हिंदू धर्म की वह अवधारणा है,जो एक प्रणाली के माध्यम से कार्य-कारण सिद्धांत की व्याख्या करते हैं।इस प्रणाली के अनुसार अच्छे कार्यों का अच्छा प्रभाव बुरे कर्मों का बुरा प्रभाव पड़ता है, जो पुनर्जन्म(Rebirth) का एक चक्र बनते हुए, आत्माओं की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं के आधार पर जन्म होता है।

वेदों, ग्रंथों में कहा गया है कि कार्य-कारण सिद्धांत , ना केवल भौतिक दुनिया में लागू होता है, बल्कि हमारे विचारों, शब्दों,कर्मो और उन कर्मों में भी लागू होता है जो हमारे निर्देश पर दूसरे करते हैं।

एक जन्म के बाद भाग्य का लेखा-जोखा अर्थात उस जन्म के हितकर और हानिकर कर्मों को दूसरे जन्म में फल मिलता है, कर्म के अनुसार।

जब पुनर्जन्म(Rebirth)समाप्त हो जाता है अर्थात जन्म लेने का सिलसिला रुक जाता है,तो इन्सान को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस प्रकार समझा जा सकता है कि  जीवन में कर्म का क्या महत्त्व है?

कहा जाता है कि पृथ्वी पर जन्म(Birth) और मृत्यु(Death)का सिलसिला योनियों में चलता है जो कि 84 लाख हैं। परंतु यह जानना आवश्यक है कि मनुष्य योनि में ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।

मनुष्य के जीवन का कर्म का चक्र चलता रहता है। जब तक कि मोक्ष की प्राप्ति ना हो। कर्मों का लेखा-जोखा एक जन्म से दूसरे जन्म में स्थानांतरित होता है।

कर्म के वृक्ष का क्या महत्त्व है?

क्रियात्मक कर्म और उनकी अवधि के प्रभाव

जैसा कि कर्म की परिभाषा को हम समझ चुके हैं कि शरीर, मन, वाणी से किया गया हर कार्य कर्म ही कहलाता है।

श्री मदभगवत गीता में कहा गया है कि जैसे मनुष्य धरती में बीज बोता है और उसके परिणाम स्वरुप फल मिलता है।वैसे ही बीज कर्म है जो हमार फल अर्थात भाग्य बनता है।

वास्तव में कर्म के प्रकार नहीं होते,परंतु समय के अनुसार अर्थात भूत एवं वर्तमान के अनुसार कर्म के प्रकार कहे गये हैं।

कर्म के वृक्ष पर वही फल प्राप्त होगा जैसा बीज रुपी कर्म बोया गया है।

1.संचित कर्म

2.प्रारब्ध कर्म

3.क्रियमाण कर्म

अनेक पूर्व जन्मों से लेकर वर्तमान में किये गये कर्मों के संचय को संचित कर्म कहते हैं।पाप और पुण्य कर्मों का संचय है, संचित कर्म।

संचित कर्मों में बहुत से कर्म बिना इच्छा व बिना जाने भी किये जाते हैं, जो कर्म के वृक्ष पर कमज़ोर हो जाते हैं, वर्तमान कर्मों के प्रभाव से।

जो कर्म अपनी इच्छा से जान बूझकर किये जाते हैं, चाहे शुभ हो या अशुभ, वही प्रारब्ध कर्म कहलाते हैं।भाव यह है कि संचित कर्म से ही कुछ अंशमात्र हमारे प्रारब्ध हैं जो हमें भोगना है, अच्छे हों या बुरे। इन कर्मों पर हमारा नियन्त्रण नहीं रहता।

क्रियमाण कर्म वर्तमान कर्मों को कहा जाता है।वह कर्म जो किये जा रहे हैं और जो हो रहे हैं, वही कर्म क्रियमाण कर्म कहे जाते है। जीवन में कर्म का क्या महत्त्व है?

इस प्रश्न का उत्तर क्रियमाण कर्म मे ही छुपा है। जो वर्तमान में किये जाने वाले कर्म हैं वो संचित कर्म में जमा होते जाते हैं। और उसी संचित कर्म का अंश प्रारब्ध(भाग्य) के रुप में मिलता है।

कर्मयोग का महत्त्व और लाभ

Importance of karma in life
Importance of karma in life

कर्मयोग का प्रतिपादन गीता में हुआ है। भरतीय दर्शन में कर्म बंधन का कारण माना गया है, जबकि कर्मयोग में कर्म, बंधन से मुक्त बताया गया है, अर्थात कर्मयोग में कर्म, बंधन का कारण नहीं है।

योग का अर्थ है, समत्व की प्राप्ति अर्थात सिद्धि-असिद्धि , सफलता-विफलता से समभाव रखना समत्व कहलाता है। अर्थात कर्मों का कुशलता से सम्पादन करना कि बंधन ना उत्पन्न हो सके।

अब प्रश्न उठता है, कौनसे कर्म बंधन उत्पन्न करते हैं और कौनसे नहीं?और कर्म के लाभ-हानि क्या हैं? गीता में कहा गया है कि जो कर्म ईश्वर के लिये निष्काम भाव से किये जाते हैं, वे बंधन उत्पन्न नहीं करते।

कर्मफल से रहित होकर ईश्वर के लिये कर्म करना,वास्तविक रुप में कर्मयोग है। और इसका अनुसरण करने से मनुष्य को मोक्ष व नि:श्रेयस की प्राप्ति होती है।

गीता के अनुसार कर्मों से सन्यास लेने अथवा उनका परित्याग करने की अपेक्षा कर्मयोग अधिक श्रेयस्कर है। क्योंकि मनुष्य एक पल भी कर्म किये बिना नहीं रहता।

अज्ञानी जीव प्रकृति से उत्पन्न सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों से नियन्त्रित होकर यदि बाह्य दृष्टि से कर्म ना भी करे,या विषयों में लिप्त ना भी हो,तो भी वह मन से चिंतन करता है।

जीवन में कर्म का क्या महत्त्व है?(Importance of karma in life) यह कहना अनुचित नहीं होगा कि कर्म करना मनुष्य के लिये अनिवार्य है।उसके बिना शरीर का निर्वाह भी संभव नहीं।

इसलिये आत्मज्ञानी मनुष्य को भी जो प्रकृति के बंधन से मुक्त हो चुका है, सदा कर्म करते रहना चाहिये।आत्मज्ञान से संपन्न व्यक्ति ही, गीता के अनुसार वास्तविक रुप से कर्मयोगी हो सकता है।

कर्म-पर्व/ कर्म के देवता

कर्म-पर्व, हरियाली प्राकृतिक पर्व के रुप में झारखण्ड, उत्तर प्रदेश व उत्तर भारत के कुछ भागों में बहुत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।सावन भादो की एकादशी को अगस्त में मनाया जाता है।

इस पर्व में बेजोड़ दिनों का चुनाव किया जाता है जैसे 3 दिन,5 दिन,7 दिन,9 दिन,11दिन।इस त्यौहार में महिलायें बालू उठाने के लिये नदी,तालाब के पस जाती हैं, उससे पहले अखड़ा में नाचती हैं फिर नहाकर डाली में बालू भरकर लाती हैं। और अपने आँगन में सात प्रकार के अनाज बोती हैं।

जों,गेहूँ,मकई,धान,उड़द,चना,कुलथी साफ़ स्थान पर बोये जाते हैं।हर रोज़ महिलायें गीत गाते हुए नाचती हैं, पूजा अर्चना करती हैं।6 दिन बाद गोबर से आँगन को शुद्ध किया जाता है।

फूल एकत्रित करती हैं, नदी पर नहाने जाती हैं, खुद को सजाती हैं। गाँव के भाईयों के साथ मिलकर कर्म डाली लाने जाती है।कोई भी भाई पेड़ पर चढ़कर , 3 डालियाँ तोड़ते हैं, पर ध्यान रखा जाता है कि नीचे ना गिरे।

फिर उन्हें आँगन में गाड़ दिया जाता है।सजी हुई थाली लिये कर्म राजा की देवता रुप में पूजा करती हैं।सभी महिलायें प्रार्थना करती हैं,भाई को सुख समृधि मिले।यह पर्व भाई बहन के प्रेम का भी प्रतीक है।पण्डित, बुजुर्गों की देख-रेख में पर्व मनाया

जाता है। पण्डित कर्म धर्म से सम्बन्धित कहानी सुनाता है । इस कहानी के ज़रिये 7.जीवन में कर्म का क्या महत्त्व है? समझाया जाता है। बहने अपने भाई की उन्नति की कामना करती है।

रात भर नाच गाने के साथ सुबह डालियों का विसर्जन किया जाता है। यह हरियाली, प्रकृति और मानव के बिच के प्रेम का अनूठा पर्व है।

कर्म के नियमों के परिणाम क्या हैं?

श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि मूल रुप से शरीर,वाणी व मन से किया गया कार्य कर्म है।मनुष्य को कर्म के साथ-साथ कर्म के तत्त्वों को जानना भी आवश्यक हैं, जो कर्मों के परिणाम निर्धारित करते हैं।

कर्म के मुख्य रुप से तीन तत्त्व हैं

1.अकर्म

2.कर्म

3.विकर्म

मनुष्य को कर्म के साथ-साथ अकर्म और विकर्म के तत्त्वों को भी जानना चाहिये।क्योंकि कर्म की गति गहन है। कर्म को अलग-अलग प्रकरण में परिभाषित करने से उसके तत्त्वों में विभिन्नता आ जाती है।

उसी प्रकार कर्म, अकर्म और विकर्म की परिभाषा भी अलग होती है। अकर्म क्या है? जो कर्म आसक्ति की भावना से ना किये जाये अर्थात जिससे संतुष्टि मिले और बाहरी तत्त्वो से प्रभावित ना हो।

जो मनुष्य कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह बुद्धिमान है योगी है, सम्पूर्ण कर्मों को समझने वाला है।

इसके विपरीत 8.जीवन में कर्म का क्या महत्त्व है(Importance of karma in life)? कर्म क्या है? समझना बेहद आवश्यक है। अकर्म के विपरीत कर्म जिसमें आसक्ति अर्थात कामना की भावना, बाहरी चीज़ों का प्रभाव व असंतुष्टि शामिल है।

विकर्म क्या है?विकर्म वो कर्म है, जो आसक्ति की दृष्टि से किया जाता है,जिसमें कामना कहीं अधिक बढ़ जाती है।

जैसे युद्ध करना कर्म है, परंतु अपना लाभ देखते हुए धर्म, अधर्म को ध्यान ना देना, पाप कहलाता है।जो विकर्म की श्रेणी में आता है। महाभारत के युद्ध में, कौरव अधर्म के लिये युद्ध कर रहे थे जो विकर्म की श्रेणी में आता है।

सभी तत्वों को जानने के फलस्वरुप इस नतीजे पर पहुँचते है की बिना आसक्ति का कर्म, अकर्म कहलायेगा, उस दशा में विकर्म का सवाल ही नहीं उठता।

कर्म कितना आवश्यक है?

कर्म से सम्बन्धित कितने ही प्रश्न हमारे दिमाग में घूमते हैं।क्या अच्छे कर्म का अच्छा और बुरे कर्म का बुरा फल मिलता है?अगर कोई इन्सान अच्छे कर्म करता है, फिर उसके साथ बुरा क्यूँ होता है? या बुरे कर्म करने वाले के साथ अच्छा क्यूँ होता है?

• कैसे भाग्य से जुड़े होते हैं कर्म?कितना जरुरी है, कर्म करना।इन सभी प्रश्नों के उत्तर एक कहानी के माध्यम से समझने की कोशिश करते हैं।

• एक बार नारद जी भगवान जी के पस गये और कहा, अच्छे कर्मों का फल अच्छा व बुरे कर्मों का फल बुरा होता है। क्या यह सत्य है? कृष्णा जी ने हाँ में जवाब दिया।

आगे नारद जी ने कहा,कि अभी एक जंगल हिरन को दलदल में फँसा हुआ देखा। तभी वहाँ से एक चोर गुज़रा, सहायता करने के स्थान पर उसने हिरन पर पैर रखकर दलदल को पार किया।

आगे जाने पर उसे हीरे जवाहरात की पोटली मिली। वह खुशी-खुशी आगे बढ़ गया ।फिर एक सन्त आये। उन्होनें हिरन को दलदल से बाहर निकाला जबकि उन्हें हाथ, पैर में काफ़ी चोटें भी आई।

नारद जी ने कहा, प्रभु! ऐसे कैसे मुमकिन है, बुरे कर्म का अच्छा फल और अच्छे कर्म का बुरा?

• भगवान जी ने कहा,तुम्हारा नजरिया गलत है देखने का। चोर को अपने पिछले जन्मों के पुण्य के आधार पर 10 पोटली मिलनी थी, जो उसके वर्तमान कर्म के कारण एक ही मिली।

और सन्त को अपने पिछले जन्मों के आधार पर मृत्यु मिलने वाली थी परंतु वर्तमान के अच्छे कर्म के कारण मृत्यु ,चोट में बदल गई।

• इस प्रकार कर्म का सिद्धांत अटल सत्य है। और 9.जीवन में कर्म के महत्तव (Importance of karma in life)कोई झुठला हीं सकता।

निष्कर्ष (CONCLUSION)

क्या कर्म की अवधारणा सत्य है?

सृष्टि में रहने वाले हर प्राणी को कर्म करना ही पड़ता है। अच्छे कर्मों का अच्छा फल, बुरे कर्मों का बुरा, यही विधि का विधान है। गीता में भी यही कहा गया है।

वैज्ञानिक तौर पर कुछ अपवाद भी सामने आते हैं।क्या वाकई हमें वेदों, ग्रंथों पर पूर्ण विश्वास करना चाहिये।एक लेखक के तौर पर इतना ही कहना चाहूँगी कि कर्म करना तो मनुष्य का धर्म है ही साथ ही जीवन में कर्म का महत्त्व क्या है(Importance of karma in life)? यह जानना भी उतना ही आवश्यक है।

एक आम इन्सान के लिये यही बेहतर है कि अपनी सोच को सही रखें, अपने कर्मों को सही रखें, इंसानियत में विश्वास रखें।

अदृश्य कर्मों या भाग्य को कौन समझ सकता है। एक बुद्धिमान इन्सान वही है जो अपनी इंसानियत और उदारता के साथ अपना जीवन जीता है। और कर्मो की उलझनों से निकलकर सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

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